Wednesday, 8 April 2015

मोगुल बादशाह अकबर 'महान' का न्यायप्रिय धर्मनिरपेक्ष बेटा जहाँगीर 'गाज़ी' और उसकी की "न्यायप्रियता और धर्मनिरपेक्षता"


नूरुद्दीन सलीम जहाँगीर का जन्म फ़तेहपुर सीकरी में स्थित ‘शेख़ सलीम चिश्ती’ की कुटिया में राजा भारमल की बेटी ‘मरियम ज़मानी’ ( मरियम उज़-ज़मानी बेगम साहिबा , जन्म 1 अक्टूबर 1542, दीगर नाम/पूर्व नाम : रुक्मावती साहिबा , राजकुमारी हीराकुमारी/ हीराकंवर और हरखाबाई, एक राजपूत शहज़ादी थीं जो मुग़ल बादशाह जलाल उद्दीन मुहम्मद अकबर से शादी के बाद मलिका हिन्दुस्तान बनें। वो जयपुर की राजपूत रियासत आमेर के राजा भारमल की सब से बड़ी साहबज़ादी थीं। ) के गर्भ से 30 अगस्त, 1569 ई. को हुआ था।
बादशाह अकबर 'महान' अपने बेटे सलीम को ‘शेख़ू बाबा’ कहा करता था, सलीम का मुख्य शिक्षक अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना था। अपने आरंभिक जीवन में जहाँगीर शराबी और आवारा शाहज़ादे के रूप में बदनाम था। अकबर की मृत्यु के पश्चात जहाँगीर ही मुग़ल सम्राट बना था। उस समय उसकी आयु 36 वर्ष की थी। ऐसे बदनाम व्यक्ति के गद्दीनशीं होने से जनता में असंतोष एवं घबराहट थी। लोगों को आंशका होने लगी कि, अब सुख−शांति के दिन विदा हो गये और अशांति−अव्यवस्था एवं लूट−खसोट का ज़माना फिर आ गया। उस समय जनता में कितना भय और आतंक था, इसका विस्तृत वर्णन जैन कवि बनारसीदास ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'अर्थकथानक' में किया है। उसका कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत है,−
"घर−घर, दर−दर दिये कपाट।
हटवानी नहीं बैठे हाट।
भले वस्त्र अरू भूषण भले।
ते सब गाढ़े धरती चले।
घर−घर सबन्हि विसाहे अस्त्र।
लोगन पहिरे मोटे वस्त्र।।"
सर्वप्रथम 1581 ई. में सलीम (जहाँगीर) को एक सैनिक टुकड़ी का मुखिया बनाकर काबुल पर आक्रमण के लिए भेजा गया। 1585 ई. में अकबर ने जहाँगीर को 12 हज़ार मनसबदार बनाया। 13 फ़रबरी, 1585 ई. को सलीम का विवाह आमेर के राजा भगवानदास की पुत्री ‘मानबाई’ से सम्पन्न हआ।
मानबाई को जहाँगीर ने ‘शाह बेगम’ की उपाधि प्रदान की थी। मानबाई ने जहाँगीर की शराब की आदतों से दुखी होकर आत्महत्या कर ली। कालान्तर में जहाँगीर ने राजा उदयसिंह की पुत्री ‘जगत गोसाई’ या 'जोधाबाई' से विवाह किया था।
1599 ई. तक सलीम अपनी महत्वाकांक्षा के कारण अकबर के विरुद्ध विद्रोह में संलग्न रहा। 21, अक्टूबर 1605 ई. को अकबर ने सलीम को अपनी पगड़ी एवं कटार से सुशोभित कर उत्तराधिकारी घोषित किया। अकबर की मृत्यु के आठवें दिन 3 नवम्बर, 1605 ई. को सलीम का राज्याभिषेक नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर बादशाह 'ग़ाज़ी’ (गैर मुसलमानों के कत्लेआम करने वाले हत्यारे को गाज़ी कहा जाता है) की उपाधि से आगरा के क़िले में सम्पन्न हुआ।
जहाँगीर बादशाह 'गाज़ी' ने बादशाह अकबर के समय तक कायम इस्लामिक अदालतों व काजियों द्वारा प्रचलित दण्डस्वरूप हाथ पांव नाक एवं कान काटने की प्रथा समाप्त की, साथ ही नई प्रथा प्रचलन में लाई गई जिसमें कोई भी जागीर सम्राट की आज्ञा के वगैर परिणय सूत्र में नहीं बन सकती थी, सप्ताह के दो दिन गुरुवार (जहाँगीर के राज्याभिषक का दिन) एवं रविवार (अकबर का जन्म दिन) को पशुहत्या पर पूर्णतः प्रतिबन्ध था यानि सिर्फ गाय ही नहीं बकरा , मुर्गा आदि भी काटना मना था यानि वर्तमान समय के अनुसार गुरूवार और रविवार "अक्ते का दिन" था पर यह ज्ञात बात है कि गौकशी प्रतिबंधित नहीं थी ,वो मोगुल/उज्बेक खानपान का प्रमुखतम हिस्सा जो थी !
जहाँगीर ने अपने कुछ विश्वासपात्र लोगों को, जैसे अबुल फ़ज़ल (अकबर के नवरत्न में से एक और अकबर की जीवनी आईन ऐ अकबरी/अकबरनामा का लेखक) के हत्यारे 'वीरसिंह बुन्देला' को तीन हज़ारी घुड़सवारों का सेनापति बनाया, नूरजहाँ के पिता ग़ियासबेग को दीवान बनाकर एतमाद्दौला की उपाधि प्रदान की, जमानबेग को महावत ख़ाँ की उपाधि प्रदान कर डेढ़ हज़ार का मनसब दिया, अबुल फ़ज़ल के पुत्र अब्दुर्रहीम को दो हज़ार का मनसब प्रदान किया। जहाँगीर ने अपने कुछ कृपापात्र, जैसे क़ुतुबुद्दीन कोका को बंगाल का गर्वनर एवं शरीफ़ ख़ाँ को प्रधानमंत्री पद प्रदान किया। जहाँगीर के शासनकाल में कुछ विदेशियों का भी आगमन हुआ। इनमें पहले अंग्रेज व्यापारी समूह के कैप्टन हॉकिन्स और सर टॉमस रो प्रमुख थे, जिन्होंने सम्राट जहाँगीर से भारत में व्यापार करने के लिए अनुमति देने की याचना की थी और अनुमतियां प्राप्त कर अंग्रेजीराज और ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की नींव रखी थी।
जहाँगीर के पाँच पुत्र थे-ख़ुसरो, परवेज, ख़ुर्रम, शहरयार और जहाँदार। सबसे बड़ा पुत्र ख़ुसरो, जो 'मानबाई' से उत्पन्न हुआ था, रूपवान, गुणी और वीर था , जहाँगीर के कुकृत्यों से जब अकबर बड़ा दुखी हो गया, तब अपने अंतिम काल में उसने ख़ुसरो को अपना उत्तराधिकारी बनाने का विचार किया था। फिर बाद में सोच-विचार करने पर अकबर ने जहाँगीर को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। ख़ुसरो के मन में बादशाह बनने की लालसा पैदा हुई थी। अपने मामा मानसिंह एवं ससुर मिर्ज़ा अजीज कोका की शह पर अप्रैल, 1606 ई. में अपने पिता जहाँगीर के विरुद्ध उसने विद्रोह कर दिया। जहाँगीर ने ख़ुसरो को आगरा के क़िले में नज़रबंद रखा, परन्तु ख़ुसरो अकबर के मक़बरे की यात्रा के बहाने भाग निकला। लगभग 12000 सैनिकों के साथ ख़ुसरों एवं जहाँगीर की सेना का मुक़ाबला जालंधर के निकट ‘भैरावल’ के मैदान में हुआ। ख़ुसरों को पकड़ कर क़ैद में डाल दिया गया। सिक्खों के पाँचवें गुरु अर्जुनदेव को जहाँगीर ने फांसी दिलवा दी, क्योंकि उन्होंने विद्रोह के समय ख़ुसरो की सहायता की थी। कालान्तर में ख़ुसरो द्वारा जहाँगीर की हत्या का षड्यन्त्र रचने के कारण, उसे अन्धा करवा दिया गया। ख़ुर्रम (शाहजहाँ) ने अपने दक्षिण अभियान के समय ख़ुसरो को अपने साथ ले जाकर 1621 ई. में उसकी हत्या करवा दी।
जहाँगीर के शासन−काल में एक बार ब्रज में यमुना पार के किसानों और ग्रामीणों ने विद्रोह करते हुए कर देना बंद कर दिया था। जहाँगीर ने ख़ुर्रम (शाहजहाँ) को उसे दबाने के लिए भेजा। विद्रोहियों ने बड़े साहस और दृढ़ता से युद्ध किया; किंतु शाही सेना से वे पराजित हो गये थे। उनमें से बहुत से मार दिये गये और स्त्रियों तथा बच्चों को क़ैद कर लिया गया। उस अवसर पर सेना ने ख़ूब लूट की थी, जिसमें उसे बहुत धन मिला था। उक्त घटना का उल्लेख स्वयं जहाँगीर ने अपने आत्म-चरित्र में किया है, किंतु उसके कारण पर प्रकाश नहीं डाला। संभव है, वह विद्रोह हुसैनबेग बख्शी की लूटमार के प्रतिरोध में किया गया हो।
जहाँगीर ने न्याय व्यवस्था ठीक रखने की ओर विशेष ध्यान दिया था। न्यायाधीशों के अतिरिक्त वह स्वयं भी जनता के दु:ख-दर्द को सुनता था। उसके लिए उसने अपने निवास−स्थान से लेकर नदी के किनारे तक एक जंजीर बंधवाई थी और उसमें बहुत सी घंटियाँ लटकवा दी थीं। यदि किसी को कुछ फरियाद करनी हो, तो वह उस जंजीर को पकड़ कर खींच सकता था, ताकि उसमें बंधी हुई घंटियों की आवाज़ सुनकर बादशाह उस फरियादी को अपने पास बुला सके। जहाँगीर के आत्मचरित से ज्ञात होता है, वह जंजीर सोने की थी और उसके बनवाने में बड़ी लागत आई थी। उसकी लंबाई 40 गज़ की थी और उसमें 60 घंटियाँ बँधी हुई थीं। उन सबका वज़न 10 मन के लगभग था। उससे जहाँ बादशाह के वैभव का प्रदर्शन होता था, वहाँ उसके न्याय का भी ढ़िंढोरा पिट गया था। किंतु इस बात का कोई उल्लेख नहीं मिलता है कि, किसी व्यक्ति ने उस जंजीर को हिलाकर बादशाह को कभी न्याय करने का कष्ट दिया हो।
"उस काल में मुस्लिम शासकों का ऐसा आंतक था कि, उस जंजीर में बँधी हुई घंटियों को बजा कर बादशाह के ऐशो−आराम में विध्न डालने का साहस करना बड़ा कठिन था।"
कुकर्मी जहाँगीर अपने पूर्वजों की ही तरह इस्लाम और अरबों से बहुत प्रभावित था -
अरब ,अफगानी, उज्बेक ,तुर्क लोगों में गिलमा यानी Salve Boys रखने की पहुत पुरानी परम्परा है इसे इज्जतदार होने की निशानी समझा जाता था अमीर उन गिलमा लड़कों के साथ कुकर्म किया करते थे कुरान में गिलमा के बारे में 'सुन्दर लडके' विशेषण के साथ कहा गया है लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि गिलमा लडके हिजड़े होते हैं ,जिन्हें कम आयु में ही Castrated करके हिजड़ा बना दिया जाता है इसके बारे में प्रमाणिक और विस्तृत जानकारी खलीफा अल रशीद और खलीफा अल अमीन के इतिहास से मिलती है जिसे सन 1948 में लन्दन से प्रकाशित किया गया था किताब का नाम "Hitti PK (1948) The Arabs : A Short History, Macmillan, London, p. 99 उसी से यह अंश लिए जा रहे हैं ,, दसवीं सदी ने खलीफा अल मुकतदिर (908 -937 ) ने बगदाद में अपने हरम में रखने के लिए 11 हजार लड़कों को हिजड़ा बनवाया ,जिनमे 7 हजार हब्शी और 4 हजार लडके ईसाई थे ( पेज 174 -175 ) ,, इसका एक उद्देश्य तो उनके साथ कुकर्म करना था .और दूसरा उदेश्य पराजित लोगों को अपमानित करना भी था ...!!
बाद में यही काम भारत में आनेवाले हमलावर मुस्लिम शासकों ने भी किया ,जैसे जब बख्तियार खिलजी ने बंगाल पर हमला किया था ,तो उसने बड़े पैमाने पर 8 से 10 साल के हिन्दू बच्चों को हिजड़ा बना दिया था बाद में मुगलों कि हुकूमत में (1526 -1799 ) में भी हिजड़े बनाए जाते रहे इसका वर्णन "आईन ऐ अकबरी" में भी मिलता है इसमे लिखा है अकबर ने 1659 में करीब 22 हजार राजपूत बच्चों को हिजड़ा बनवाया बाद में जहाँगीर ने और औरंगजेब ने भी इस परंपरा को चालू रखा ताकि हिन्दू वंशहीन हो जाएँ इस से पहले सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने 50 हजार और मुहम्मद तुगलक ने 20 हजार और इतने ही फिरोज तुगलक ने भी हिजड़े बनवाये थे ,,यहां तक कुछ ऐसे भी हिजड़े थे जो दिल्ली के बादशाह के सेनापति भी बने ,जैसे अलाउद्दीन का सेनापति "मालिक काफूर " हिजड़ा था और कुतुबुद्दीन का सेनापति "खुसरू खान " भी हिजड़ा ही था महमूद गजनवी और उसके हिजड़े गुलाम के "गिलमा बाजी" (homo sexual ) प्रेम यानि कुकर्म (Sodomy ) को अल्लामा इकबाल (सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा का लेखक और पाकिस्तान बनाये जाने की विचारधारा का जनक) जैसे शायर ने भी आदर्श बताया है .क्योंकि यह कुरान और इस्लाम के अनुकूल है..!!
चलें, जहाँगीर की न्यायप्रियता और असली इतिहास पर ही ध्यान देते हुऐ विश्लेषण करते हैं, इस्लाम और मौगुलों के संयुक्त कुकर्मों पर निश्चय ही फिर कभी विश्लेषणात्मक दस्तावेजी लेक लिखेंगें।
गुरु हरगोबिंद सिंह सिक्खों के छठे गुरु थे, जिनका जन्म माता गंगा व पिता गुरु अर्जुन सिंह के यहाँ 14 जून, सन् 1595 ई. में बडाली (भारत) में हुआ था। गुरु हरगोबिंद सिंह ने एक मज़बूत सिक्ख सेना संगठित की और अपने पिता गुरु अर्जुन की मोगुल बादशाह जहाँगीर 'गाज़ी' की हत्या के बाद (मुग़ल शासकों (1606) के हाथों पहले सिख शहीद) निर्देशानुसार सिक्ख पंथ को योद्धा-चरित्र प्रदान किया था।
गुरु हरगोविंद से पहले सिक्ख पंथ निष्क्रिय था। प्रतीक रूप में अस्त्र-शस्त्र धारण कर, हरगोविंद गुरु के तख़्त पर बैठे। उन्होंने अपना ज़्यादातर समय युद्ध प्रशिक्षण एव युद्ध कला में लगाया तथा बाद में वह कुशल तलवारबाज़ और कुश्ती व घुड़ सवारी में माहिर हो गए। तमाम विरोध के बावज़ूद हरगोविंद ने अपनी सेना संगठित की और अपने शहरों की क़िलेबंदी की। 1609 में उन्होंने अमृतसर में अकाल तख्त (ईश्वर का सिंहासन ) का निर्माण किया,, बादशाह जहाँगीर ने सिक्खों की मज़बूत होती हुई स्थिति को ख़तरा मानकर गुरु हरगोबिंद सिंह को ग्वालियर में क़ैद कर लिया। गुरु हरगोबिंद सिंह बारह वर्षो तक क़ैद में रहे, लेकिन उनके प्रति सिक्खों की आस्था और मज़बूत हुई। अंतत: मोग़ुलों का विरोध करने वाले भारतीय राज्यों के ख़िलाफ़ सिक्खों का समर्थन प्राप्त करने के उद्देश्य से बादशाह पीछे हटे और गुरु को रिहा कर दिया।
अंत में जहाँगीर ने अपने उत्तर जीवन में शासन का समस्त भार नूरजहाँ को सौंप दिया था। वह स्वयं शराब पीकर निश्चिंत पड़े रहने में ही अपने जीवन की सार्थकता समझता था। शराब की बुरी लत और ऐश−आराम ने उसके शरीर को निकम्मा कर दिया था। वह कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं कर सकता था। सौभाग्य से अकबर के काल में मुग़ल साम्राज्य की नींव इतनी सृदृढ़ रखी गई थी, कि जहाँगीर के निकम्मेपन से उसमें कोई ख़ास कमी नहीं आई थी। अपने पिता द्वारा स्थापित नीति और परंपरा का पल्ला पकड़े रहने से जहाँगीर अपने शासन−काल के 22 वर्ष बिना ख़ास झगड़े−झंझटों के प्राय: सुख−चैन से पूरे कर गया था। नूरजहाँ अपने सौतेले पुत्र ख़ुर्रम को नहीं चाहती थी। इसलिए जहाँगीर के उत्तर काल में ख़ुर्रम ने एक−दो बार विद्रोह भी किया था; किंतु वह असफल रहा था। जहाँगीर की मृत्यु सन् 1627 में उस समय हुई, जब वह कश्मीर से वापस आ रहा था। रास्ते में लाहौर में उसका देहावसान हो गया। उसे वहाँ के रमणीक उद्यान में दफ़नाया गया था। बाद में वहाँ उसका भव्य मक़बरा बनाया गया। मृत्यु के समय उसकी आयु 58 वर्ष की थी।
जहाँगीर की परिस्थितियों और उसकी इस्लामिक प्रकृति ने ही उसे पूर्वजों की ही तरह मुल्लाओं मौलानाओं की गोद में जा बैठने के लिए मजबूर किया , उसने सिक्खों के गुरु अर्जुन सिंह सहित कई हिंदू व जैन धर्माचार्योंका क्रूरतापूर्वक वध करवाया ,कांगड़ा के हिन्दू दुर्ग पर विजय प्राप्त करने पर उसने वहाँ के मंदिर में गाय कटवा कर उसको अपवित्र किया इस तरह के अपने कई इस्लामिक साम्राज्यवादी कुकर्मों पर वह अपनी आत्मकथा ‘तुजुक ऐ जहाँगीरी’ में इन क्रूर कर्मों पर गर्व करता है, जहाँगीर ने, अपनी जीवनी, ''तारीख-ई-सलीमशाही' और 'तुजुक ऐ जहांगीरी' में लिखा था कि ''अकबर और जहाँगीर के आधिपत्य में पाँच से छः लाख की
संखया में हिन्दुओं का वध हुआ था।''
(तारीख-ई-सलीम शाही, अनु. प्राइस, पृष्ठ 225-26)
सारांश - यहाँ यह लेख और वर्णन करने का मेरा उद्देश्य और आशा है, कि वामपंथी सेना, सेक्यूलर इतिहासकारों के हाथों जो भारत के इतिहास की हत्या हुई है उसे किसी ना किसी तरह अपने क्षुद्र प्रयासों से जिलाने और सबके सामने लाने का यत्न हम सब यथासंभव करें,जवाहरलाल नेहरू के लिखित भारत एक खोज के द्वारा जिस तरह से स्वनिर्मित व्याख्याओं से भारतीय इतिहास का संहार शुरू हुआ उसे वामपंथी जेएनयू व एएमयू के जलील इतिहासकारों द्वारा ऐसा तथाकथित रूप से लिपिबद्ध किया जो इतिहासकारों द्वारा इतिहास की हत्या करना ही कहा जा सकता है।
मेरा यह प्रयास हम सब के लिये है ताकि हम में से वे लोग ''जो व्यावहारिक ज्ञान की अपेक्षा सिद्धान्त बनाने और व्यक्तिगत नायक /Individual Hero बनाने में अधिक सिद्ध हस्त हैं, उनके मस्तिष्कों में भी वास्तविकता, सच्चाई और सामान्य ज्ञान का कुछ उदय हो जाए।"

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